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Saturday, October 26, 2019

भारत में ग्रामीण शिक्षा की उपलब्धि और नवाचार

भारत में ग्रामीण शिक्षा की उपलब्धि और नवाचार

 ग्रामीण शिक्षा 
      अगर आपको लगता हैं की आपके बच्चे में कॉन्फिडेंट की कमी हैं  अपने बच्चे के सामने सकारात्मक बात ही करे एवं छोटी  बातो पर उसको डाटना नहीं चाहिए। अगर बह कुछ बताना चाहता हैं तो उसकी पूरी बात सुने और उसका जबाब भी देना चाहिए उसको ,उसके दोस्तों के साथ खेलने दे , उससे सबाल जबाब करे उसकी  निर्णय  लेने की  छमता में उसका सहयोग करे हैं। 
       ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत छोटा बच्चा गीली मिट्टी के समान होता हैं शिक्षक उसको जैसा चाहे वैसा बना दे  भारत में पहले साक्षरता दर के मुकाबले आज ग्रामीण क्षेत्रो में यूवा और कॉलिफाइड टीचर की व्यवस्था सरकार कर रही हैं जो की ग्रामीण क्षेत्रो में जा कर उन गरीव बच्चो को शिक्षा प्रदान करा रहे हैं। 
      किसी देश की शिक्षा निति मजबूत हैं तो उस देश का शिक्षा तंत्र मजबूत होता हैं यह सब सुबिधाय शिक्षक को मिले तो वह  शिक्षक  कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटेगा। 
       ग्रामीण शिक्षा को लेकर आज वस्तु स्थिति सपस्ट नही हैं वर्तमान में मिडिल स्कूल के 90 परसेंट बच्चे कक्षा 9 में पड़ने लायक नहीं हैं   जो दुर्दशा शिक्षा की हुई हैं उसके लिए सिर्फ शिक्षक ही जिम्मेदार नहीं हैं क्योकि जिन बच्चो को कक्षा 1 ,2 , 3 ,4 ,5 में फेल होना चाहिए था वो अगर आज 9 कक्षा में पहुंचे तो शिक्षा वभाग के फेल न करने के नियम के कारण। 
       लोग कहते हैं शिक्षक ने बच्चो की पढ़ाई लिखाई पर ध्यान नहीं दिया लेकिन सरकार उन पर ध्यान देने दे तब 80 बच्चो पर 1 या 2 टीचर और उन्हें भी कभी sc और कभी obc कभी समग्र छात्रवृति तो कभी आधार ,या कितनो के कहते खुले अभी तक कभी गाँव में कितनी लेट्रिन बनी एस.ऍम.सी. कभी  पी.टी.ए. 


जनगणना ,मतगणना ,गणवेश ,साईकिल ,आधार ,खाता ,समग्र ,रूबेला ,एल्बेंडाजोल ,मध्यान्ह भोजन ,गैस कनेक्शन ,
    जैसे इन सब से फ्री होकर शिक्षक बच्चो को पढ़ाने का मन बनाये तो 15 दिन के कोर्स को 3 महीने का बनाकर 11 पेज की पुस्तक को 400 पेज की बनाकर फिर उलझा दिया फिर भी हर वर्कबुक हर कॉपी पर लाल घेरा लगाओ शिक्षक ने इसके बाद  खुद को तैयार किया लेकिन फिर टीचर हेंड बुक शिक्षक मार्ग दर्शिका का बोझ शिक्षक के सर पर होता हैं। 
      लेकिन इस परिवर्तन के दौर में ग्रामीण शिक्षा को लेकर शिक्षक सजग और धैर्यवान हैं जो अपने कर्तव्यों को हमेशा पूरी ईमानदारी के साथ निभाता हैं। 
       आज के समय में सभी लोग सरकारी मास्टर को तो कुछ  समझते ही नहीं लेकिन हकीकत इसके बिपरीत हैं। और विभागों में आपकी सर्विस लग सकती हैं पर एक टीचर की सर्विस मिलना बहुत मुश्किल है कठिन परिश्रम करके टीचर बनता हैं और लोग उस पर कमेंट्स करते हैं टीचर्स परीक्षा में लाखो लोग एग्जाम देते हैं पर उनमे से कुछ चुनिंदा लोग ही इस काविल होते हैं  जो टीचर  बन सके और जो लोग  इन परीक्षाओ में असफल  हो जाते हैं  वह  प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं और आप और हम अपने बच्चो को उन प्राईवेट स्कूलों में भेजते हैं और वह स्कूल हम से मोटी  कमाई करते हैं। 
      जो टीचर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर पूरी ईमानदारी से छात्रों को अध्यापन कार्य करा रहा हैं।  उसका अपमान भी नहीं करना चाहिए। शायद आप लोग भूल गए होंगे लेकिन मुझे यद हैं की में भी एक ग्रामीण सरकारी स्कूल से निकला हूँ।  मेने भी अपना  अध्यापन  गांव के स्कूल से ही किया हैं। हमारे समय में थोड़ी सुविधाय कम थी पर आज तो सरकार ग्रामीण शिक्षा के  क्षेत्रों  में बहुत सी सुविधाय उपलब्ध करवा रही हैं। 
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ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा-
        Basic Education In Rural Areas ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा के अंतर्गत बच्चे की प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत  ग्रामीण परिवेश के आधार पर होती हैं ग्रामीण शिक्षा के आधार पर कहा गया हैं। की बच्चे की प्रथम गुरु माँ होती हैं।  ग्रामीण शिक्षा में इसका और अपनी क्षेत्रीय भाषा का बहुत महत्व हैं। बच्चे को  ग्रामीण शिक्षा के माध्यम से क्षेत्रीय भाषा में अध्यापन कार्य कराया जाना बहुत महत्वपूर्ण हैं। जिससे उसका मानसिक विकास हो सके और वह अपने आसपास के परिवेश के बारे में जान सके। 

              ग्रामीण क्षेत्रो में भाषा को प्राथमिकता दे गई हैं भारत की  अधिकांश आवादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रो में रह रही हैं जो की मजदूरी का कार्य करते हैं ग्रामीण क्षेत्रो में मजदूरी करना ही उनकी प्राथमिक आय का श्रोत हैं जिससे वह अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं लेकिन अब इस परिवर्तन के दौर में ग्रामीण शिक्षा के लिए शिक्षक भी कमर कस चके हैं और वह भी अपनी पूरी मेहनत ग्रामीण क्षेत्रो में कर रहे हैं। 

       ग्रामीण क्षेत्रो में शिक्षा की गुणवत्ता एक सामान्य बिषय नहीं था इसके लिए इसके लिए शिक्षक को दोषी माना जाता था लेकिन अब परिस्थितियों को देखते हुए शिक्षक भी पूर्ण ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं और सरकार भी पूर्ण सहयोग प्रदान कर रही हैं बच्चो को फ्री में बुक ,ड्रेस ,साईकिल ,और भी अन्य शुविधाय दे रही हैं। 


       ग्रामीण क्षेत्रो में एक प्रायवेट स्कूलों का मुद्दा भी बहुत चल रहा हैं प्रायवेट स्कूल बच्चो को लालच देकर अपने पास खेचते हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रो के सरकारी स्कूलों में नामंकन की भी समस्या उतपन्न होती हैं। ये लोग ग्रामीण क्षेत्रो के गरीव लोगो को लालच देकर बच्चो का एडमिशन कर लेते हैं और फिर फीस के लिए उनको परेशान करते हैं फीस नहीं देने पर उनको टी सी नहीं देते हैं जिससे बच्चो की साल भर की पढ़ाई बर्बाद होती हैं और वह बच्चा फिर से सरकारी स्कूल में आ जाता हैं


      ग्रामीण शिक्षा में एक क्रन्तिकारी पहल हुई हैं 2002 से अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम बना जिससे बाल मजदूरी पर अंकुश लगा और ग्रामीण बच्चे स्कूल जाने को प्रेरित हुए इनके माता पिता ने भी इनका सहयोग किया और बच्चो को स्कूल भेजने के लिए सहमति बनी। 


        ग्रामीण शिक्षा में प्राइवेट स्कूलों का भी योगदान रहा हैं जिन क्षेत्रो में स्कूल नहीं थे वहा प्राइवेट स्कूल खुलने से पढ़ने बाले छात्रों को आसानी हुई इससे पहले गांव के बच्चे 3 -4 किलो मीटर पैदल जाकर अपनी शिक्षा पूरी करते थे इसलिए इस कदम को सराहा जाता हैं। एक कारण और हैं जिस तरह प्राइवेट स्कूलों में 25 प्रतिशत आर,टी ,ई ,के छात्रों की भर्ती की जा रही हैं जिससे ग्रामीण लोगो को फायदा हैं परन्तु इससे कुछ दिनों में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था बंद होने की कगार पर हैं ग्रामीण सरकारी स्कूलों में नामांकन 5 -20 अधिकतम हर स्कूल का हाल हैं जिस पर शिक्षकों की व्यवस्था  और स्कूलों का मेंटेनेंस राशि का खर्चा सब सरकार को करना पड़ता हैं।  

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       बर्तमान ग्रामीण शिक्षा में बहुत अंतर आ चुका हैं अब छात्रों को मुफ्त शिक्षा के साथ साथ किताबे ,यूनिफॉर्म ,स्कॉलरशिप ,साईकिल ,लेपटॉप ,आदि बिभिन्न प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं।


       ग्रामीण शिक्षा  के क्षेत्र में आज भी ग्रामीण लोग सहयोग कम ही करते हैं बच्चो को स्कूल भेज कर पालक  मजदूरी करने चले जाते हैं  अगर शिक्षक को किसी कागज पर साइन करना हो तो पालक  का इंतजार में  ४-५ दिन लगजाए। 
    ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का विस्तार तो हुआ हैं,  साथ ही पलकों में जागरूकता भी आई हैं। 
        शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर विचार उत्पन्न होते हैं। 
        किन्तु आज निजी स्कूलों में शिक्षा शव्द ने अपने अंदर का अर्थ इस कदर खो दिया हैं कि आज न उसके अंदर का संस्कार जिन्दा हैं और न व्यबहार, शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकता , अनैतिकता  के बीच दब गई हैं।  शिक्षा के माध्यम से अब न चरित्र आ रहा हैं ना मानवीय मूल ,न नागरिकता ,संस्कार ,न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्टार को लेकर चिंता जताई जा रही हैं। 
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निशुल्क मध्यान भोजन-Mid Day Meal-
        ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की सबसे बड़ी पहल हैं की आज सब सरकारी  स्कूलों में निशुल्क मध्यान भोजन के साथ बहुत सी सुबिधाए उपलब्ध करा रही हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को उनका लाभ मिल रहा हैं। छोटे छोटे गरीब बच्चे तो केवल भोजन और खेलने के लिए ही स्कूल आते हैं और उनको खेल खेल में शिक्षा  के माध्यम से उनकी दक्षताओं की पूर्ति भी हो जाती हैं ये सब ग्रामीण क्षेत्र योग्य टीचर के माध्यम से ही सम्भब हो सका हैं 
         मध्यान भोजन एक बहुत बढ़िया स्कीम हैं इस कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण बच्चे स्कूल आने के लिए उत्साहित होते हैं और ग्रामीण शिक्षा के साथ -साथ मध्यान भोजन की व्यवस्था भी बच्चो को मिलती हैं जिससे बच्चे स्कूल आते हैं इस कार्यक्रम में स्कूलों में बच्चो की उपस्तिथि में बृद्धि हुई हैं। 
      Mid-Day-Meal के अंतर्गत ग्रामीण बच्चे स्कूल आने के लिए उत्सुक होते हैं क्योकि मेनू के अनुसार मिड डे मील का कार्यक्रम चलाया जाता हैं जिससे बच्चो को हर दिन कुछ नया खाने को मिलता हैं और कभी -कभी ग्रामीण लोग भी इस योजना का लाभ लेते हैं। और चेक करते हैं की मिड डे मील बनाने बाला समूह भोजन गुणवत्ता दे रहा हैं या नहीं जिससे समूह को भी भय बना रहता हैं और वह गुणवत्ता पूर्ण भोजन की व्यवस्था करता हैं जिससे छात्रों को लाभ मिलता हैं। 
      ग्रामीण शिक्षा के माध्यम से बच्चो में स्कूल  आने की प्रति भावना का विकास करना ही मूल उद्धेश्य हैं और रूचि पूर्ण मध्यान्ह भोजन  हैं। एक बात सत्य हैं की ग्रामीण क्षेत्रो में रहने बाले लोग गरीव होते हैं और मजदूर वर्ग ज्यादा होता हैं जिससे वह अपने बच्चो पर ध्यान नहीं दे पाते और शिक्षा के प्रति जागरूक भी नहीं कर पाते जिससे कुछ बच्चो को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती हैं और अपने परिवार के पालन के लिए मजदूरी करनी पड़ती हैं गरीवी ही ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य समस्या हैं। 
    ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत सर्व प्रथम 1925 में मद्रास नगर निगम ने गरीव बच्चो के लिए मध्यान्ह भोजन का कार्यक्रम चलाया था तथा 1980 तक यह भारत के 3 राज्य तमिलनाडु , गुजरात ,केरल इन केंद्र शासित प्रदेशो ने अपने बल पर ग्रामीण बच्चो के लिए 1990 से 1991 तक मध्यान भोजन का कार्यक्रम चलाया था  तथा इसको  बाद में 12 राज्यों तक बढ़ाया गया था। 
         ग्रामीण क्षेत्रो में मिड डे मील कार्यक्रम में इसके मापदंड निर्धरित किये गए हैं प्राथमिक स्तर पर कितना खर्च कोगा और मिडिल स्तर पर कितना इसमें इसमें प्राथमिक स्तर पर राशि दर रुपय 1.68 प्रति बच्चे की हिसाब से और मिडिल में रूपया 2.50 प्रति बच्चे की हिसाब रखा गया हैं जिससे मिड डे मील चलने वाले समूह को भी नुकसान न हो और बच्चो को गुणवत्ता पूर्ण भोजन की वयवस्था होती रहे। 




         वर्ष 2001 में MDM  पका हुआ  मध्‍याह्न भोजन योजना  बन  गई  जिसके तहत प्रत्‍येक सरकारी और गैर सरकारी  सहायता प्राप्‍त प्राथमिक स्कूलों  के प्रत्‍येक  बच्‍चे  को  8-12 ग्राम  प्रतिदिन  प्रोटीन  और  ऊर्जा  के न्‍यूनतम 300 कैलोरी अंश के साथ  मध्‍याह्न  भोजन  परोसा  जाना  था। स्‍कीम का वर्ष 2002 में न केवल सरकारी, गैर सरकारी सहायता प्राप्‍त और स्‍थानीय निकायों के स्‍कूलों  को  कवर  करने के लिए अपितु शिक्षा गारंटी, स्‍कीम  (EGS)  और  ब्रज कोर्स,  और , आँगन बाड़ी  केन्‍द्रों,  में पढ़ने वाले बच्‍चों तक भी विस्‍तार किया गया था।
      Mid Day Meal बच्चो का स्कूलो में नामांकन बढ़ाने के मुख्य उद्धेश्य से किया गया हैं और उनकी उपस्तिथि स्कूल में  बानी  रहे  एवं  बच्चो  को पोषण आहार भी मिलता रहे ग्रामीण शिक्षा के माध्यम से  राष्टीय  पोषण कार्यक्रम 15 अगस्त 1995 से शुरू किया गया हैं  केंद्र द्वारा आयोजित इस योजना को पहले देश के  2408  व्लाको  में प्रारंभ किया गया था 1997 -98 तक इसको देश के सभी व्लाको में शुरू किया गया 2002 में इसको बड़ा कर सरकारी स्कूलों के अलाबा आगनबाड़ी केन्द्रो और गैर सरकारी संस्थओं में पढने बाले कक्षा 1 से 5 तक के सभी छत्रो के लिए प्रारंभ किया गया।   
Mid-Day-Meal


 Rural Education India-
       बर्तमान समय में Rural Education से संबंधित कई महान लेखकों  के लेख सामने आते हैं लेकिन ये लोग ग्रामीण शिक्षा को अपने मन की कल्पनाओ के आधार पर लिख देते हैं इनको ग्रामीण क्षेत्र की वस्तु स्थिति की जानकारी नहीं होती जो लोग ग्रामीण क्षेत्रो से निकल कर आते हैं उनको ग्रामीण शिक्षा एवं ग्रामीण बच्चो की जानकारी बहुत अच्छे से होती हैं। वही लोग ग्रामीण क्षेत्र के बारे में बहुत अच्छा लिख सकते हैं और आपको सही और सटीक जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। 
      Rural Education India ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत बहुत सी मूलभूत दक्षतायेँ आती हैं जिनको पूर्ण करने पर ग्रामीण शिक्षा का सही अर्थ लगाया जा सकता हैं। 
     ग्रामीण शिक्षा के माध्यम से छात्रों की मिलभूत दक्षतायेँ पूर्ण करना उनको हर क्षेत्र में पारंगत करना,छात्रों को सम्पूर्ण शिक्षा चाहे वह धार्मिक हो या सांस्कृतिक या वैज्ञानिक तकनीकी क्षेत्र में  हो यही शिक्षा का उद्देश्य हैं। 
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अनिबार्य शिक्षा -
  • अधिनियम में  अनिबार्य शिक्षा से मतलब हैं -
  • 6  से 14 बर्ष के सभी बच्चो का स्कूल में नाम दर्ज हो -
  • सभी नामांकित बच्चे नियमित रूप से स्कूल  जाय -
  • सभी कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा पूरी करे -
स्कूल  सुबिधा -
      अधिनियम के अंतर्गत मध्य  प्रदेश राज्य शिक्षा का अधिकार नियम बनाये हैं इसमें हर एक बसाहट से एक किलोमीटर की परिधि में कक्षा 1 से 5 तक स्कूल खोलने की व्यवस्था हैं लेकिन उस जगह पर कम से कम 40 बच्चे हो। 
    कक्षा 6 से 8 तक स्कूल खोलने के लिए यह दूरी 3 किलोमीटर हो तथा बच्चो की संख्या 12 रखी गई हैं। 
इन बच्चो के राज्य सरकार कई योजनाय चला रही हैं -


विशेष प्रशिक्षण -
  1. स्कीनिंग  पर रोक - 
  2. केपिटिशन फीस पर रोक -
  3. कक्षा में रोका नहीं जायगा -
  4. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन -
  5. शाला प्रबंधन समिति -
  6. प्रायवेट स्कूलों को मान्यता -
  7. स्कूल संचालन के लिए मापदण्ड -
  8. शिक्षको की संख्या -


  • 60 बच्चो पर 2 शिक्षक 
  • 61 से 90 बच्चो पर 3  शिक्षक 
  • 91 से 120 बच्चो पर 4  शिक्षक
  • 121 से 200 बच्चो पर 5 शिक्षक 
  • 201 से अधिक होने पर 40 बच्चो पर एक शिक्षक 
  • 150 बच्चो पर 1 प्रधान अध्यापक  
स्कूली बच्चो के टीका करण खसरा -रूबेला  (M.R.)-
      ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हैं शासन गांव के हर स्कूल में प्रत्येक छात्र को गंभीर बीमारी से बचाने के लिए  हर सम्भब प्रयास कर रही हैं ग्रामीण क्षेत्र के हर स्कूल तक यह जानकारी हैं की खसरा -रूबेला,फोलिक ऐसिड,एल्बन्डा जॉल,क्या हैं और इनका क्या उपयोग हैं।
खसरा रोग क्या हैं  तथा यह कैसे फैलता हैं -
     खसरा एक जानलेवा रोग हैं जो वायरस से फैलता हैं खसरा रोग के कारण बच्चो में विकलांगता एवं असमय मौत का कारण हो सकती हैं।
खसरे के क्या लक्ष्ण हैं ?
खसरा यह बेहद संक्रमक रोग हैं यह इससे प्रभबित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलता हैं लक्ष्ण - चेहरे पर गुलाबी दाने,खासी ,बुखार ,नक् बहना , आँखों का लाल हो जाना। 
   खसरा -रूबेला किन (M.R.) टीका किन -किन बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता हैं। 
      खसरा -रूबेला में (M.R.) का  टीका सुरक्षा प्रदान करता हैं इसके साथ ही यदि गर्भवती महिलाओ को रूबेला के प्रति प्रतिरक्षित किया जा चूका हैं।  तो नव जात शिशु भी कंजेनिटल रूबेला सिंड्रोम (C.R.S.) के प्रति सुरक्षित रहेंगे।  
 स्कूली बच्चो के टीका करण के दौरान माता -पिता की उपस्तिथि के लिए क्या योजनाए हैं ?
  ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली बच्चो का टीका कारण शिक्षकों की उपस्तिथि में किया जाता हैं फिर भी यदि माता-पिता चाहे तो टीका कारण के समय वे अपने बच्चे के साथ रह सकते हैं। 
टीका करण अभियान में दिए जाने बाला M.R. का टीका कितना सुरक्षित हैं ? और यह किन-किन देशो में दिया जाता हैं ?
   M.R./M.M.R. का टीका जो पिछले 40 वर्षो से दुनियाभर में दिया जाता हैं। यह पूर्णतः सुरक्षित हैं। हमारे देश में भी निजी चिकत्सक M.R./M.M.R. टीका पिछले कई वर्षो से बच्चो को दे रहे हैं वर्तमान में दुनियाभर दे 149 देशो में M.R./M.M.R. टीका दिया जा रहा हैं।


    खसरा -रूबेला  (M.R.) का  टीकाकरण स्वास्थ्य केन्द्रो के स्थान पर स्कूलों में क्यों किया जा रहा हैं। 
   खसरा -रूबेला  (M.R.) अभियान सभी जगहों स्कूलों , अस्पताल ,एवं स्वास्थ्य केन्द्रो -पर चलाया जा रहा हैं इसमें 9 माह से 15 बर्ष तक के आयु वर्ग के अधिकतर बच्चे स्कूल जाते हैं।  इसलिए टीका कारण अभियान स्कूलों में चलाया जाता हैं स्कूल न जाने बच्चो को समुदाय में आऊटरीच गतिविधि के माध्यम से टीका कृत किया जाता हैं। 
 इसी प्रकार, फोलिक ऐसिड,एल्बन्डा जॉल, की गोलियों का भी उपयोग किया जाता हैं इन गोलियों को पहले शिक्षक खाते  हैं और फिर बच्चो को खाने को दी जाती हैं .

ग्रामीण क्षेत्रो में समस्या -

             ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में आज भी लोग इंडिया के ग्रामीण क्षेत्रो में अपनी सोच को विकसित नहीं कर पाए हैं जिस कारण से बच्चो को शिक्षा के क्षेत्र में अपनी दक्षताओं की पूर्ति करने में परेशानी आती हैं क्यों की आज भी ग्रामीण क्षेत्र में पालक इतने सक्षम नहीं हैं की अपनी बच्चे की शिक्षा के लिए वह शिक्षक से मिल सके और उनसे अपने बच्चे क शिक्षा के लिए चर्चा कर सके।  क्यों की ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर मजदूर  वर्ग रहते हैं और उनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए  दुसरो पर निर्भर रहना पड़ता हैं जिससे वह  बच्चो को समय नहीं दे पते। 
           ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत सरकारी स्कूलों में सभी प्रकार की सुविधाए उपलब्ध हैं फिर भी ग्रामीण लोग उन शिक्षकों का समर्थन नहीं करते जिससे जिससे उनका मनोबल भी गिरता हैं। 


      इस प्रकार की शिक्षा निति से आज शिक्षक वर्ग भी आहत हैं जिस प्रकार शिक्षकों पर शिक्षा के अतिरिक्त और अन्य कार्य भी कराय जाते हैं और फिर बिभाग अच्छे रिजल्ट की उम्मीद करता हैं। 


         ग्रामीण स्कूल से अभिप्राय हैं।  अधिनियम के अंतर्गत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाए हैं।  इसमें प्रत्येक बसाहट ,ग्राम ,टोला ,मजरा, से 1 किलो मीटर की परिधि में कक्षा 1 से 5 तक स्कूल खोलने की व्यवस्था हैं शर्त इतनी हैं की उस स्थान पर 40 बच्चे उपलब्ध होने चाहिए कक्षा 6 से 8 तक स्कूल खोलने के लिए यह दुरी 3 किलो मीटर तथा बच्चो की न्यूनतम संख्या 12 रखी गई हैं   
          सरकार ग्रामीण एवं शहरी स्कूलों में  विभिन्न प्रकार की सुबिधाय उपलब्ध करा रही हैं जिससे बच्चो की उपस्तिथि में भी बृद्धि होती हैं और जिनको बच्चे पसंद भी करते हैं जैसे मध्यान्ह भोजन ,पुस्तक वितरण ,साईकिल वितरण ,गणवेश वितरण ,एवं कई प्रकार की स्कोलरशिप भी बच्चो को उपलब्ध कराई जाती हैं।


         सरकारी स्कूलों में संस्कार के साथ साथ खेल ,गतिविधि के माध्यम से खेल -खेल में शिक्षा और भयमुक्त वातावरण के साथ हर प्रकार की सरकारी सुविधा और हमेशा योग्य टीचरों का सहयोग।  

बर्तमान समय में ग्रामीण शिक्षा-

             भारत में आज बड़े -बड़े बुद्धिजीवी हैं जो की ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा को लेकर अपने-अपने विचार रखते रहते हैं लेकिन उनको ग्रामीण स्तर की जानकारी होती नहीं हैं और ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में अपने मत देते हैं। 
    
          लेकिन बर्तमान समय में ग्रामीण शिक्षा बहुत आगे निकल चुकी हैं लोगो की सोच गलत हैं की ग्रामीण क्षेत्रो में पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं हैं लेकिन इसको आप ग्रामीण क्षेत्रो में पहुंच कर देख सकते हैं की ग्रामीण क्षेत्रो में शिक्षा का वहुत प्रसार हुआ हैं। 

    सरकार द्वारा चुनिंदा और योग्य टीचर आज भारत के हर गांव में जाकर शिक्षा की ज्योत जला रहे हैं और ग्रमीण बच्चो को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। ग्रामीण शिक्षा के माध्यम से शिक्षक अपनी स्थानीय भाषा में बच्चो को शिक्षा प्रदान करते हैं और उनको आने बाली कठिनाइयों को दूर करते हैं जिससे बच्चे आसानी से समझ कर अपनी दक्षताओ की पूर्ति करते हैं। 


शिक्षा की गुणवत्ता संबंधी मुद्दे गरीवी से कही अधिक शक्तिशाली हैं।लेकिन छात्रों को उत्साहित करने के लिए शिक्षक कई प्रकार की गतिविधि करवाते हैं जिससे छात्र उत्साहित होकर अपनी दक्षताओं की पूर्ति करते हैं। लोगो का मन्ना हैं की छात्रों को बिना पढ़ाए एक कक्षा से दूसरी कक्षा में उन्नत किया जाता हैं लेकिन वह उनके विवेक पर निर्भर करता हैं कुछ बच्चे इसमें पूर्ण हो जाते हैं कुछ बच्चे ही रहते हैं जो कमजोर होते हैं। 


   प्राथमिक स्तर पर बच्चो को पढ़ाना कोई छोटी बात नहीं होती यह वह छोटे बच्चे होते हैं जो घर से निकल कर सीधे शिक्षक के पास आते हैं और वह कोरा कागज होते हैं। उन्हें घर के अलावा कुछ भी पता नहीं होता वह बहार के परिवेश के वारे में नहीं जानते की घर के बाहर भी दुनिया हैं ऐसे ग्रामीण पालको के बच्चो को ये शिक्षक पढ़ाते हैं। और उन बच्चो में शिक्षा की गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं। 

ग्रामीण शिक्षा में खेल-
      "ग्रामीण शिक्षा में खेल" का एक अलग महत्व हैं शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण स्तर पर प्राइमरी स्कूलों में 1 कालखण्ड खेल बिषय का भी रखा गया हैं, जिससे "बच्चो को खेल में रूचि पैदा हो" और उनका मन खेल -खेल में शिक्षा के साथ अपने शरीर का व्यायाम भी हो, और "एक स्वस्थ शरीर में सवस्थ मस्तिष्क का विकास होता हैं।" 

         ग्रामीण क्षेत्रो से खेलो के माध्यम से कई प्रकार की प्रतिभाय निकल कर आती हैं, हम जिस बच्चे के बारे में नहीं सोच सकते बह बच्चा न जाने किस खेल में इतिहास वना दे, इसलिए सभी बच्चो को खेलने का अवशर  दिया जाना चाहिए।  

        खेलो के माध्यम से बच्चे में विभिन्न प्रकार की क्रियाएं को जन्म दिया जा सकता हैं, बच्चा समहू में गठन,निर्देशन,आज्ञा पालन, भाईचारा, सहने की छमता आदि गुणों का "विकास" किया जा सकता हैं। 

        ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा में खेल अनिवार्य कर दिया गया हैं जिसके माध्यम से हर शिक्षक ग्रामीण स्तर पर खेल के माध्यम से शिक्षा का कार्यक्रम चला रहा हैं और शिक्षा और खेल दोनों मिलकर एक सम्पूर्ण शिक्षा का निर्माण करते हैं बच्चो में रूचि उत्पन्न होती हैं शिक्षक विभिन्न प्रकार के ग्रामीण और स्थानीय खेल खिला कर बच्चो में खेल भावना का विकाश करते हैं। 
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 समस्याएं -
        भारत में ग्रामीण शिक्षा का स्तर कमजोर होने का मुख्य कारण हैं ग्रामीण क्षेत्रो में निवास करने बाले अधिकांश लोग गरीवी रेखा के नीचे जीवन  यापन करते हैं इन लोगो को अपने भोजन का प्रबंध करने के लिए मजदूरी करना पड़ती हैं । भारत में ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत मजदूर वर्ग के लोगो को मोटिबेट करने की  जरूरत हैं। 
  ग्रामीण क्षेत्रो में मजदूर वर्ग ज्यादा होता हैं क्योकि शिक्षा की कमी के कारण इन लोगो ने शिक्षा का अर्थ नहीं समझा और ये अपने बच्चो को भी पढ़ाने  में रूचि नहीं दिखाते। 
 ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत भारत सरकार कई प्रकार की सुविधाय चला रही हैं लेकिन मजदूर वर्ग के लोग उन योजनाओ का लाभ नहीं ले पा रहे  हैं जिस कारण से यह मुख्य समस्या हैं की ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे शिक्षा ले वंचित रह जाते हैं। 
ग्रामीण क्षेत्रो में मजदूरी के कारण यह लोग अपने बच्चो को सरकारी स्कूलों में  नहीं भेज पाते हैं क्योकि जब घर के लोग मजदूरी करने जाते हैं तब इनके बच्चे घर पर रह कर घर की देखभाल करते हैं और उनके छोटे भाई बहन को सम्हालते हैं जिस कारण उनकी पढ़ाई बाधित होती हैं।  

 समाधान -
         ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत मजदूर  वर्ग काम करता हैं जिस कारण वह अपने बच्चो को शिक्षा देने में असमर्थ हैं। लेकिन अगर इन लोगो से मिलकर इनको शिक्षा की गुणवत्ता उसके परिणाम एवं उनके बच्चो के भविष्य के बारे में चर्चा की जाए उनको इसके लाभ हानि के बारे में समझाया जाए  उनसे सतत सम्पर्क में रहकर इस काम को किया जा सकता हैं। 
    शिक्षा की अहमियत एवं सरकार की योजनाओं के बारे में इन लोगो को पूरी जानकारी दी जानी चाहिए जिससे इनमे उत्साह पैदा होगा और ये अपने बच्चो को स्कूल भेजने की सहमति प्रदान करेंगे।  आज गरीव से गरीव आदमी भी अपनी संतान को पढ़ाना चाहता हैं इस भावना का विकास करना होगा। 
    ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का विस्तार करना होगा  मजदूर वर्ग के लोगो का सहयोग लेकर इस उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती हैं और उनके बच्चो को शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शिक्षा प्रदान करना ही इस समुदाय की प्राथमिकता हैं।  
विकास-
           ग्रामीण शिक्षा के अंतर्गत सरकार बिभिन्न प्रकार की योजनाए चला रही हैं इन योजनाओ का लाभ देश के सभी छात्रों  को मिलान चाहिए।
       शिक्षा विभाग को लेकर आज बड़े -बड़े  अनुसन्धान किये जाते हैं जिससे छात्रों को बहुत फायदा होता हैं कई प्रकार की योजनाए सरकार चला रही हैं 
       जैसे - मध्यान्ह भोजन ,यूनिफार्म ,स्कॉलरशिप ,किताबे , साइकिय , 
और मेरिट लिस्ट में आने बाले छात्रों के लिए 85 / के ऊपर लेन पर लेपटॉप , इसेक बाद 40 प्रकार की स्कॉलरशिप  जो की प्राथमिक स्तर से सुरु होकर ग्रेजुएट होने तक सरकार इसका लाभ छात्रों को देती हैं। 
सरकरी स्कूलों में सुबिधाये भी हर एक सरकारी  मिडिल /हाई  स्कूल में कम्प्यूटर से लेकर हर प्रकार की सुबिधाए  उपलब्ध हैं। 

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Rural education In India

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